मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शनिवार को अल्मोड़ा पहुंचे और हवालबाग में आयोजित ‘खेती बचाओ अभियान’ में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने किसानों और पर्यावरण को लेकर गंभीर चिंता जताई।
सीएम ने कहा कि अन्नदाता ही समाज का असली नायक है और खेती बचाने का यह अभियान अब जन आंदोलन का रूप ले चुका है। लाखों किसान मिट्टी को बचाने के लिए आगे आ रहे हैं।
उन्होंने साफ कहा कि अब आत्मचिंतन की जरूरत है, क्योंकि लगातार रासायनिक प्रयोगों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घट रही है और इसका असर खेती व मानव स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा है।
खेती बचाओ आंदोलन बना जन अभियान
सीएम धामी ने कहा कि खेत बचाओ आंदोलन अब एक व्यापक जन आंदोलन बन चुका है। बड़ी संख्या में किसान मिट्टी और खेती को बचाने के लिए जुड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि अन्नदाता समाज की रीढ़ है और उसका सम्मान करना हर किसी की जिम्मेदारी है।
रसायनों से मिट्टी की सेहत पर असर
मुख्यमंत्री ने कहा कि 50 साल पहले मिट्टी नरम, उपजाऊ और प्राकृतिक होती थी, जो लोगों को बीमारियों से बचाने में मदद करती थी। लेकिन आज रासायनिक प्रयोगों के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति लगातार घट रही है। उन्होंने कहा कि “दुखी मन से कह रहा हूं, धरती मां अंदर से रो रही है”, इसलिए परंपरागत खेती को अपनाने की जरूरत है।
जलवायु संकट और बदलता मौसम
सीएम ने कहा कि पूरा विश्व जलवायु संकट से जूझ रहा है। मौसम में बदलाव हो रहा है, समय से बारिश नहीं हो रही और ओलावृष्टि जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संतुलन के अनुसार खेती करनी होगी, तभी भविष्य सुरक्षित रह सकता है।
जल स्रोत घट रहे, संरक्षण जरूरी
उन्होंने कहा कि पारंपरिक जल स्रोत जैसे गाड़-गधेरे और नौले तेजी से खत्म हो रहे हैं। कोसी नदी का जल स्तर भी घट रहा है। इन जल स्रोतों को बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि यही खेती और जीवन का आधार हैं।
सरकार की योजनाओं का जिक्र
सीएम धामी ने कहा कि किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सुरक्षा कवच दे रही है। 115 करोड़ की सहायता से पॉलीहाउस दिए गए हैं और 1000 करोड़ की रेनफेड योजना संचालित है। इसके अलावा 1200 करोड़ से फल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
एरोमा और पशुपालन पर जोर
उन्होंने कहा कि सगंध खेती के लिए महक क्रांति नीति लागू की गई है और 7 एरोमा क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। 23 हजार हेक्टेयर भूमि में इसकी खेती हो रही है। साथ ही मौन पालन और पशुपालन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इकोनॉमी और इकोलॉजी को साथ लेकर चलना होगा, तभी समृद्धि संभव है।